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  • साहित्य : शब्द ब्रह्मा है । शब्दशक्ति मानव मात्र के संवाद की प्रथम सीढ़ी है । माँ सरस्वती आराध्य है। शब्द रंजन,शब्दरचना सभी विधाओं की रचना कृति में लोकसंवाद,लोकत्म,लोकाध्यात्म,लोकरंजन,अध्यात्म चिंतन दर्शन का आधार होने के कारण कलासृष्टि में महत्वपूर्ण स्थान है। इस विधा से लोक जीवनादर्श,लोक संवेदना,लोक संबोधन,प्रबोधन तथा समाज का दर्पण दर्शनीय होता है । सांसारिक जगत में विभिन्न भाषा विन्यास के कारण भी सभी को जोड़ने ,आत्मसात करने,मन,बुद्धि,अहं के प्रगटीकरण की सहज माध्यमिका है साहित्यविधा । कला जगत का आधारस्तम्भ कहा जाये तो अतिशयोक्ति नहीं ।
  • संगीत : ध्रुपद में वेदों का गायन होता है । सभी घरानों का मूल है ओम । त्वं ओम का प्रतीक है । तनानानाना यही निनाद है । लोक गीतों का मूल श्रोत भी यही है । नाद की मधुरता से शब्दों में जो राग उत्पन्न होता है वाही संगीत कहा जाता है । इसका उद्गगम वेद तथा लोक संगीत है । अतः यह प्राचीन धरोहर है । संगीत में लय है तो मन का विलय होता है लय नहीं तो प्रलय । मानवमात्र के ह्रदय तंत्री को झंकृत करने की प्रमुख विधा है संगीत । समाजजीवन पुरुषत्व से ईशरत्व की ओर सन्मार्ग दर्शक है संगीत ।
  • नाट्य : इस विधा के माध्यम से ह्रदयस्पर्शी कृति रूपदरशम का बोध,कलाकार में प्रतिभा विकास,समाज चित्रण की यह सशक्त शैली है । इस विधा में समस्त विधाओं रंग रस रूप स्वर शब्द चित्रकला का समावेश है । जीवन दर्शन की प्रेरणादायी कृति हैद्य आत्मविभोर व सह्रदय श्रेष्ठ कला है नाट्य । भरत मुनि उसका आदर्श है,कला ही जीवन है यह ध्येय दर्शन का प्रतीक है ।
  • चित्रकला : चित्रकला का सम्बधबपरकश से है चित्रकारी से मनोभावों का रूप प्रकट होता है । चाहे प्रकति का हो,चाहे व्यक्तित्व का हो,चाहे मूर्ति का हो । वह वातावरण को प्रसन्न कर देता है । अमूर्त को मूर्त करने की प्रक्रिया चित्रकला विधा में प्रकट होती है ।
  • रंगोली : यह सबसे प्राचीन विधा है । यहाँ रंगोली निकली जाती है वह शिव का अधिष्ठान मिल जाता है । सूर्य है वहां तेजस्विता है,प्रकाश है,यहाँ सूर्य है वहां जीवन है । सृस्टि का महाप्राण सूर्य है । रंगोली जब विभिन्न चिन्हों से निकाली जाती है तो वह सत्य,शिव और सुंदर का रूप लेकर आँगन में आती है ।
  • प्राचीन कला : कला का मूलस्रोत,गंगोत्री है यह कला । प्रकृति के विराट का दृश्य उसकी भव्यता,मनुष्यता की महानता के लक्ष्य के रूप में देखे जा सकते हैं । पुरातत्व,निसर्ग को अपनी हिन्दू कला दृष्टि से देखने का दृष्टिकोण इस कला से अपेक्षित है । गुफाओं के दर्शन तक ही सीमित नहीं है,यह तो प्राकृतिक स्रोतों का दर्शन,पत्थरों की भाषा,उनकी प्रकृति,उनकी बोली,उसकी एक अद्धभुत अनुभूति इस कला में निहित है । समाज जीवन व कलाकार के आत्मबोध को अध्यात्म प्रबोध,पुरुषार्थ की प्रेरणा पुरखो के अधूरे स्वप्नों की पूर्णता हेतु परंपरा स्रोत हैद्य
  • लोककला : सभी कलाओं का मूलस्रोत ;गंगोत्री द्ध लोककला में प्रतिबिम्बित हैद्य वह अकृत्रिम और अनौपचारिक रूप से प्रकट होती हैद्य इन विविध रूपों से जनसामान्य के हृदय की भावनाएं लोककलाओं के माध्यम से प्रकट होती है सामान्य से सामान्य गिरिवासी,वनवासी अन्य सामान्य किसान जैसे अनपढ़ लोग भी लोककलाओं को प्रकट करते हैंद्य इसकी परम्परा हजारों सालों से भारत में विधमान हैद्य आज के चित्रपटो व नाटकों में लोक कलाओ को नया रूप दे कर जो कहानियाँ प्रस्तुत की रही हैं वे समाज भर्ती हैंद्य लोकजीवन की या किसी भी समाज की अंतरात्मा है लोक कला । लखनऊ में लोककला महोत्सव तथा उण् प्रण् में शासन स्तर पर १६२ लोककलाओं का प्रदर्शन हुआ ।