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विधाओं के कार्यक्रम


मानव ने कलाओं के संबंध में यह माना है कि प्रमुख पंचकला पंचतत्व पंच महाभूतों से सम्बद्ध है। शिल्पकला पृथ्वी से, नाट्य कला आप तत्त्व से, चित्रकला तेज तत्त्व से, नृत्य वायु तत्त्व से और संगीत आकाश तत्त्व से, ये पंच महातत्व परमानंद सत्यं शिवं सुंदरम के लिए हैं। हमारी ध्येय दृष्टि गीत संगीत से नवनिर्माण की कल्पना ले कर जुड़ी है । साहित्य, गीत, नाट्य सप्तरंग, सप्तस्वर, नवरसों से पूर्ण होती है विमुक्त की कल्पना। इसीलिए हमारा ध्येय वाक्य भी है 'सा कला या विमुक्तये'।

  • नव संवत्सर स्वागत ( वर्ष प्रतिपदा चैत्र शुक्ल ) : इस दिन ब्रह्माजी ने सृष्टि निर्माण का मुहूर्त किया । श्रीराम का राज्यभिषेक व सम्राट शालिवाहन का शकों पार् विजय का है । अतः यह विजयदिवस है ।
  • गुरुपूर्णिमा (अाषाढ़ पूर्णिमा ) : भारत में गुरु परंपरा सभी छेत्रों है।ज्ञान . विज्ञान . व्यास , कला में नटराज सत्य ही शिव और शिव ही सुंदर का दर्शन , तांडव विनाश के लिए और लास्य स्थाई भाव में सृजन व परम शांति का धोतक है हमारा नटराज । गुरुपूजन कलाकार के लिए श्रेयकर है ।
  • श्रीकृष्ण जन्माष्टमी : श्रीकृष्ण १६ कलाओं के अवतार हैंए पूर्ण पुरुष हैं।उन्हें नटवर लाल भी कहा गया है।रासलीला , गरबा , मुरलीवादन यह सभी समाज जागरण और समाज संगठन के लिए किया । समाज के छोटे छोटे घटक (ग्वाला ) को जोड़ा । श्रीकृष्ण शिक्षक और संगठन दृष्टि से अादर्श हैं ।
  • दीपावली परिवार मेला (कार्तिक अमावस्या ) : समाज स्थिरता में परिवारिक योगदान का सबसे बड़ा महत्व है।कलाकार व कार्यकर्ता का जीवन परिवारिक भाव स्थिर हो यह अत्यंत अावश्यक है।हमारी पद्यति भी सभी को साथ लेकर चलने की परिवारिक पद्यति है।अंधकार से प्रकाश , अज्ञान से ज्ञान , कुटुम्ब व्यवस्था का सामंजस्य , खुशियों का सामूहिक अादान प्रदान का दीपावली पर्व प्रतीक है।
  • भारत माता पूजन (गणतंत्र दिवस २६ जनवरी ) : संस्कार भारती ने इस उत्सव को अादर्शो से जोड़ा है।भारतमाता के चित्र दर्शन को विराट :प में सामने लाना , सब देवों से बड़ी है हमारी भारत मा।कलाकार कार्यकर्ता का जीवन अादर्श है हमारी भारत मा।अाज संविधान का निर्माण हुअा है इसमें स्वत्व का बोध होता है।अपना धर्म , अपनी भाषा , चिन्ह , प्रतीक , विधान , संविधान और अपनी अस्मिता का राष्ट्रव्यापी प्रबोध है।अतः कलाकार के लिए मा भारती का पूजन सभी देवताओ का पूजन है
  • भरतमुनि जयंती (माघ पूर्णिमा ) : कलाक्षेत्र के प्रणेता भरतमुनि के जन्मदिवस का यह अायोजन है।नाट्य शास्त्र अादि ग्रंथ है।नत्य कला लोक धर्म के परिपालन के लिए प्रतिबध है।यह व्यवसाय नही समाज प्रबोधन का महत्वपूर्ण अनुष्ठान है।कलाओ मे समन्वय , साहित्य , कला , संगीत , वास्तु , रंग तथा प्रकृति का मूलश्रोत भी नाट्य कला में निहित है । नाट्य यह जीवन का विशु) प्रतिबिंब है । भरतमुनि ने कहा श्ब्रह्माजी के चरणों में सूत्र बनाये गए , शिवजी ने उन्हें अभिनीत किया , मैने लिपिबध किया , मेरा अपना कुछ नही है।श् यह दर्शन भरतमुनि ने दिया।जो गुरु प्रति एक अादर्श कलाकार से अपेक्षित है।यह कलाकार कार्यकर्ता का पावन पूज्यपर्व है |